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मेरी नजर से

Friday, May 6, 2011

विश्व कप फाइनल

रणधीर बढो, गंभीर बढो,
चढ़कर शिखरोँ पर पग धर लो;
धीर बढो, तुम वीर बढो,
अड़कर तूफानोँ को हर लो;

सचिन-सरीखे रत्न जहाँ, 

सम्मिलित संगठित यत्न जहाँ;
प्रबल- प्रखर प्रयत्न जहाँ, 

योँ कुशल चपल दल और कहाँ.. 

आ गई घड़ी, लंका मेँ आग लगा दो;
कनक सिँहासन पर अधिकार जमा लो..

समर भूमि मेँ फिर अपने,

जौहर की झलक दिखा दो;
बाधाएँ बड़ी, अंधियारे घने,
पौरुष का दीप जला लो;
 
विध्वंस मचे, सब भंग-भंग,
शत्रु-दर्प कर खंड-खंड, ध्वज लहरा लो..

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